छतरपुर जिले की बड़ा मलहरा तहसील से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है प्रसिद्ध तीर्थस्थल ‘भीमकुंड’। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में स्थित यह स्थान प्राचीनकाल से ही ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों एवं साधकों की स्थली रही है। वर्तमान समय में यह स्थान धार्मिक पर्यटन एवं वैज्ञानिक शोध का केंद्र भी बन हुआ है।
छतरपुर जिले की बड़ा मलहरा तहसील से मात्र 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है प्रसिद्ध तीर्थस्थल ‘भीमकुंड’। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में स्थित यह स्थान प्राचीनकाल से ही ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों एवं साधकों की स्थली रही है। वर्तमान समय में यह स्थान धार्मिक पर्यटन एवं वैज्ञानिक शोध का केंद्र भी बन हुआ है। यहां स्थित जल कुंड भू-वैज्ञानिकों के लिए भी कौतूहल का विषय है। दरअसल, यह कुंड अपने भीतर ‘अतल’ गहराइयों को समेटे हुए हैं।
भीमकुण्ड” मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले में 79 कि. मी. दूर स्थित एक प्राकृतिक जल-स्त्रोत है…यहाँ घूमने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं….इसकी गहराई का पता लगाने की कोशिश कई स्थानीय लोग और कई वैज्ञानिक अपने-अपने तरीकों से कर चुके हैं लेकिन अब तक कोई इसकी गहराई का पता नहीं लगा पाए..कहते हैं कि यह जलधारा पाताल से निकली है..
और पाताल लोक तो भई अभी तक मैं खुद न देख पाई तो क्या ही व्याख्यान दु इस बारे में की कितनी गहराई होगी भीम कुंड की ..जिसके बारे में वैज्ञानिक फेल हो गए ।
आश्चर्य की बात तो यह है कि वैज्ञानिक इस जल कुंड में कई बार गोताखोरी करवा चुके हैं, किंतु इस जल कुंड की थाह अभी तक कोई नहीं पा सका। ऐसी मान्यता है कि 18वीं शताब्दी के अंतिम दशक में बिजावर रियासत के महाराज ने यहां पर मकर संक्रांति के दिन मेले का आयोजन करवाया था। उस मेले की परंपरा आज भी कायम है। मेले में हर साल हजारों लोग शामिल होते हैं।
भीम कुंड एक गुफा में स्थित है। जब आप सीढ़ियों से अंदर कुंड की तरफ जाते हैं, तो यहां पर कुंड के चारों तरफ पत्थर ही पत्थर दिखाई देते हैं। यहां लाइट भी कम होती है, लेकिन यहां का नजारा हर किसी का मन मोह लेता है। भीम कुंड के ठीक ऊपर बड़ा-सा कटाव है, जिससे सूर्य की किरणें कुंड के पानी पर पड़ती हैं। सूर्य की किरणों से इस जल में अनेक इंद्रधनुष उभर आते हैं।
यह भी कहा जाता है कि इस कुंड में डूबने वाले व्यक्ति का मृत शरीर कभी ऊपर नहीं आता, जबकि आमतौर पर पानी में डूबने वाले व्यक्ति का शव एक समय पश्चात खुद-ब-खुद ऊपर आ जाता है। इस कुंड में डूबने वाला व्यक्ति सदा के लिए अदृश्य हो जाता है। भीम कुंड के प्रवेश द्वार तक जाने वाली सीढ़ियों के ऊपरी सिरे पर चतुर्भुज विष्णु तथा लक्ष्मी का विशाल मंदिर बना हुआ है।
विष्णु-लक्ष्मीजी के मंदिर के समीप एक और प्राचीन मंदिर स्थित है। इसके ठीक विपरीत दिशा में एक पंक्ति में छोटे-छोटे 3 मंदिर बने हुए हैं, जिनमें क्रमश: लक्ष्मी-नृसिंह, राम दरबार और राधा-कृष्ण के मंदिर हैं। भीम कुंड एक ऐसा तीर्थ स्थल है, जो व्यक्ति को इस लोक और परलोक दोनों के आनंद की अनुभूति कराता है।
क्या है भीमकुंड की कहानी : भीमकुंड से जुड़ी पौराणिक कथाएं भी हैं। ऐसी मान्यता है कि महाभारत के समय जब पांडवों को अज्ञातवास मिला था तब वे यहां के घने जंगलों से गुजर रहे थे। उसी समय द्रौपदी को प्यास लगी। लेकिन, यहां पानी का कोई स्रोत नहीं था। द्रौपदी व्याकुलता देख गदाधारी भीम ने क्रोध में आकर अपने गदा से पहाड़ पर प्रहार किया। इससे यहां एक पानी का कुंड निर्मित हो गया। कुंड के जल से पांडवों और द्रौपदी ने अपनी प्यास बुझाई और भीम के नाम पर ही इस का नाम भीम कुंड पड़ गया।
इसके आलावा इस कुंड को नील कुंड या नारद कुंड के नाम से भी जाना जाता है। बताते हैं कि एक समय नारदजी आकाश से गुजर रहे थे, उसी समय उन्हें एक महिला और पुरुष घायल अवस्था में दिखाई दिए। उन्होंने वहां आकर उनकी इस अवस्था का कारण पूछा तब उन्होंने बताया कि वे संगीत के राग-रागिनी हैं। वे तभी सही हो सकते हैं, जब कोई संगीत में निपुण व्यक्ति उनके लिए सामगान गाए।
नारदजी संगीत में पारंगत थे। उन्होंने उसी समय सामगान गाया जिसे सुनकर सारे देवतागण झूमने लगे। विष्णु भगवान भी सामगान सुनकर खुश हो गए और एक जल कुंड में परिवर्तित हो गए। उनके रंग के जैसे ही इस कुंड का जल नीला हुआ तभी से इसे नीलकुंड भी कहा जाने लगा।
कई वैज्ञानिकों ने इस पर रिसर्च करके पता लगाने की कोशिश की कि इसका जल इतना साफ और स्वच्छ कैसे है? और इसकी गहराई भी जानना चाही लेकिन आज तक कोई भी इसके रहस्य को सुलझा नहीं पाया है। एक बार जब गोताखोर इसके अंदर गए थे तो उन्होंने बताया था कि अंदर 2 कुएं जैसे बड़े छिद्र हैं। एक से पानी आता है और दूसरे से वापस जाता है और उसकी स्पीड भी बहुत तेज है।
जब हमने यहां मौजूद लोगों से बात की तब उन्होंने बताया कि उन्हें लगता है कि इसका संबंध सीधे समुद्र से है, क्योंकि इस कुंड के एक तरफ से जहां जाली नहीं लगी हुई है, वहां से जो भी लोग इसमें डूबे हैं उनकी लाश तक नहीं मिली है। इसके अलावा जब समुद्र में सुनामी आई थी तब इस कुंड में भी हलचल हुई थी। इसके पानी की लहरें 10 फुट तक उठ रही थीं। उस समय यहां मौजूद सारे के सारे लोग डरकर बाहर निकल गए थे।
इसका जल हमेशा साफ और स्वच्छ रहता है। इसमें काफी गहराई तक की चीजें साफ दिखती हैं और जब सूर्य की रोशनी इस कुंड पर आती है तब बहुत ही मनमोहक दृश्य दिखता है। इसके अलावा एक रहस्य यह भी है कि इस कुंड का जलस्तर कभी कम नहीं होता। यहां पर बने आश्रम जहां बहुत सारे बच्चे भी रहते हैं और आसपास के सारे क्षेत्र में यहीं से पानी की सप्लाई होती है। लेकिन पानी खत्म होना तो दूर, गर्मियों के समय में भी यहां का जलस्तर कभी कम नहीं होता है।
एक बार तो सरकार की ओर से भी इसका तल जानने के लिए वॉटर पंप से यहां के पानी को निकाला गया था, तब भी यहां का स्तर कम नहीं हुआ।
इसकी गहराई का पता लगाने की कोशिश कई स्थानीय लोग और कई वैज्ञानिक अपने-अपने तरीकों से कर चुके हैं लेकिन अब तक कोई इसकी गहराई का पता नहीं लगा पाया है। कहते हैं कि यह जलधारा पाताल से निकली है।
जन-श्रुतियों के अनुसार महाभारत-काल में जब पाण्डव वनवास पर थे तब उन्होंने अपना कुछ समय बुंदेलखंड में भी गुजारा था। द्रौपदी को प्यास लगने पर भीम ने जोर से जमीन पर अपनी गदा से प्रहार करके इस कुण्ड का निर्माण किया था जोकि पाताल-कुण्ड भी कहा जाता है।
इस कुण्ड की कुछ और मुख्य विशेषताओं में से एक यह भी है कि इस कुण्ड का जल एकदम स्वच्छ,नीला एवं पारदर्शी एवं औषधीय गुणों से परिपूर्ण है। इस जल की तुलना मिनरल-वाटर से की जाती है।
इस कुण्ड में यदि कोई डूब जाता है तो अन्य जलाशयों की तरह उसकी लाश ऊपर नहीं आती बल्कि अंदर ही कहीं लुप्त हो जाती है। अब इसमें जल-सतह से कुछ नीचे एक बड़ा सा जाल लगा दिया गया है ताकि इसमें कोई डूबे न।
स्थानीय लोगों का कहना है कि किसी प्राकृतिक आपदा के आने से पहले ही यह कुण्ड चेतावनी दे देता है जैसे कि सुनामी आने के पहले ही इसमें अपने-आप ऊंची-ऊंची तरंगे उठने लगी थी।
भीमकुंड की गहराई का पता नहीं चल पाया है । कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि इस कुंड की 80 फीट गहराई के नीचे बहुत तेजी से चलने वाली जलधाराएं बहती हैं जो इसे समुद्रों से जोड़ देती हैं l यह मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से लगभग 77 किमी दूर बाजना गांव में स्थित है । यह एक प्राकृतिक जल कुंड है ।
भीमकुंड के बारे में यह कहानी है कि जब वनवास के दौरान पांडव यहां से गुजरे तब द्रौपदी को प्यास लगी। कुछ देर विश्राम करने एवं देवी द्रौपदी की प्यास बुझाने के लिए भीम ने धरती को प्रणाम करके गदा से प्रहार किया। भीम की गदा के प्रहार से यह कुंड अस्तित्व में आया l
Shaded in the Panna district of Madhya Pradesh, the Pandav Falls grace the banks of Ken River and reign at a height of around 30 meters. Named after the Pandava brothers from the Indian Epic Mahabharata who are believed to have been there, the area is loaded with natural gems.